पहला अध्याय.. आ ज से आठ साल पहले की बात हैं,एक परिवार में कुल ६ लोग थे माँ पिताजी और उनके चार संतान जिसमे चारों लड़कियाँ थी एक भी बेटा नहीं था I लेकिन उनके पिताजी को बहुत ही लालसा था एक लड़के की मगर भगवान् की यही कृपा थी की उनको एक भी बेटा नहीं दिया,परन्तु पिताजी कभी भी इन चारों को लड़की नहीं समझते थे,वे हमेशा यही कहते की ये चारों मेरे बेटे हैं,छोटी बेटी माँ पाप को बहुत चाहती थी और हमेशा उनके बारे में सोचते रहती थी,माँ पाप बहुत ही लार प्यार से बच्चों की परवरिश कर रहे थे और घर में कमाने वाला सिर्फ उनके पिताजी ही थे सारे परिवार की देखभाल और सभी लड़कियों की खर्चा पानी पढ़ाई लिखाई और परिवार की राशन खाने की सारी व्यवस्था पिताजी ही कर रहे थे क्योंकी उनके घर मैं और कोई था नहीं इसलिए सारा परिवार का दायित्व उनपर था पिताजी एक प्लांट में काम करते थे बहुत ज्यादा तनख्वा नही था उसी छोटी सी नौकरी से उन्होंने सारे परिवार को बहुत ही जत्न से पाल पोश रहे थे Iइसमे सबसे बड़ी बेटी हमेशा माँ पाप की चिंता बहुत करती थी हा लेकिन एक और बेटी थी जो हमेशा यही सोचते रहती की कब मैं बड़ी ह...