संदेश

सफ़र

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" क्या माँ बाप को ऐसे करते हैं कोई ” ये दोनों बुजुर्ग पति पत्नी दिल्ली के यमुना पार में रहते हैं ये अपना दो वक़्त की रोटी खुद जुंगार करते हैं I जनवरी महीना कंपकपाती ठंड हो या जून जुलाई की पैर जलने वाली गर्मी का महीना दोनों पति पत्नी रोड के किनारे ग्राहक का इंतजार करते की कोई आये और उनके ठेला से कुछ खाने के सामान खरीद ले,इसी आस में टकटकी लगा के आते जाते राहगीरों को निहारते रहते हैं अगर कोई राहगीर ठेले से कुछ खरीद लेते हैं तो पति पत्नी दोनों बहुत खुश होते और बड़े प्यार से सामान देते हैं इनकी निगाह हमेशा आते जाते लोगों पर रहती हैं क्योंकी इनकी रोजी रोटी का सवाल हैं , प्रतिदिन घर के खर्च की व्यवस्था जो करनी पड़ती हैं  I  इन दोनों पति पत्नी की कहानी बहुत दुख भरी हैं इस बुजुर्ग महिला के पति नेहरूजी के समय सरकारी नौकरी करते थे रेलवे की नौकरी १० से ५ की थी अच्छी नौकरी होने के वाबजूद इन्होने सरकारी नौकरी छोड़ दी आज लोगों को पैसे दे कर भी सरकारी नौकरी नहीं मिल पता हैं मगर इनके साथ बात कुछ और थी परिवार बड़ा होने के कारण इन्होनें अपनी सरकारी नौकरी छोड़ दी और इनके पिताजी ने कहा बर्फ का कारोबार...

साल का जशन

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                                                                      इस संसार की रचना भगवान् ने कितनी सिद्दत और फुर्सत से की और उस धरती को सुंदर बनाये रखने के लिए एक नारी को भेंजा .   नारी ने धरती में इन्सान को जन्म दिया फिर धरती में इंसानों की आबादी बढ़ी. मगर इन्सान को ये रास नहीं आया और इन्होनें धरती को ही नष्ट करना शुरु कर दिया I   आज धरती ऐसी डगर पर आ गया की कभी भी इसका विनाश या खत्म हो सकता हैं, मगर इन्सान अपनी भोग विलाश में इतना मशगुल हैं की उन्हें ये पता नहीं की वह क्या कर रहा हैं और अंधों की तरह पाप किये जा रहा हैं.जहाँ नारी का अपमान होता हैं वहाँ भगवान् भी नाराज हो जाते हैं और फिर वो अपना प्रकोप किसी प्रकार से देते हैं चाहे देश में कोरोना हो या और कुछ I  १ जनवरी २०२३ नये साल की पहली रात की बात कर रहा हूँ, इस रात में नये साल की ख़ुशी में लोग एक दुसरे से गले मिलते है तो कोई खुशियाँ मान...

पुनःमिलन..

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                            💕💕💖                               “ HAPPY   NEW   YEAR ”               शाम की आखरी पड़ाव पर आ चुका. हम जिसमें कुछ रिश्ते सुधरे और सुधारने की कशमकश में अंदर ही अंदर सवाल जवाब में घिरे हुये हैं,क्या पहले कदम मेरी हो या उसके तरफ से पहला हो. अभी रात के ९.३० बजे हैं घड़ी की सुई आगे की ओर बढती जा रही हैं. नये साल की पहला दिन मनाने के लिये फूल तो मैं ऑफिस से लौटते वक़्त ले आये थे,घड़ी की सुई टिक टिक कर आगे जा रहे और धड़कने भी तेज होती जा रही हैं. ऐसा क्या था जो इतने करीब रह के भी चार कदम चल के, जाने की झिझक सी हो रही हैं. क्या एक छोटी सी बात के इतना गहरा असर हो सकता हैं की चार कदम जा के उनको मुबारकबाद भी ना दे सकूँ. अब बजे गये ११.३० फूल उठा लिया, हाथ में गाड़ी की चाबी थी,दरवाजा लॉक कर के निकला हूँ,पूरी तैयारी के साथ अगले साल के आखरी दिन में वो आखरी झगड़ा खत्म कर लूँ   १२.०० बजने...

मास्क..

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                                             😍😍😊               " मास्क किसी के मुहं में लगा देखने से अब डर सा लगने लगा हैं ऐसा प्रतीत होता हैं की कोरोना वापिस आ गया है और चारो तरफ कोरोना वायरस नज़र आने लगता हैं "               वही आँखों में तस्वीरे आने लगता हैं की मरीजों को इलाज करते डॉक्टर पी पी किट पहने सामने खड़ा हो और कोई मरीज एम्बुलेंस में जा रहा हो कोई अपने परिवार के लिए ऑक्सीजन की सिलेंडर ले के भाग रहा हो लम्बी लम्बी लाइने दवाई के दुकानों में लगी रहती थी और अगर आपको खांसी जुकाम हो गया तो टेस्ट करवाने चले गए तो स्वस्थ आदमी यही सोचने लगता है की पता नहीं कौन सा टेस्ट करेंगे ये पी पी किट पहने हुए डॉक्टर स्वस्थ आदमी भी उस समय बीमार समझने लगता अपने आप को और सोचता की मुझे क्या हो गया भगवान मेरी टेस्ट नेगेटिव कर देना ये प्रार्थना करने लगते है वास्तविकता में घबराहट सभी को लगता था कोरोना के टेस्ट से चाहे व...

बस्ता

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                       किसी के पीठ में बस्ता किसी के कंधे में और  किसी के सर पर बस्ता बस्ता मतलब आप लोगों को क्या लगता हैं,कौन सी बस्ते के बारे हम बोल रहे है थोड़ा दिमाग लगायें की मैं क्या बोलना मतलब लिखना चाहता हूँ I आप सोच रहे है कि बस्ता मतलब स्कूल का बस्ता.. मतलब कुछ भी निकाल सकते हैं मगर यह बस्ता बहुत ही अलग तरह का है I यह जन्म से लेकर मृत्यु तक आपके साथ यह बस्ता चलता रहता हैं I मगर लोग कुछ और ही समझते हैं,वास्तविक में बस्ता हमारी जिंदगी में बहुत कुछ सीखा कर जाते हैं और यह हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित भी करता रहता हैं और हम इस बस्ता को मृत्यु तक ढोते रहते हैं I तो आपको बताता हूँ आखिर किस बस्ते के बारे मैं कहना चाहता हूँ I बचपन में हम गाँव के पाठशाला जब जाते थे तो हाथ में ही किताब कॉपी हुआ करता था,कुछ बच्चे थैला में भी किताब कॉपी ले के आते थे,पहली से चार तक हाथ में ही किताब कॉपी ले जाया करते थे,परन्तु अब तो पहली कक्षा से ही बस्ता दे दी जाती है और इस बस्ते की वजन बहुत ज्यादा नहीं थी हाँ बस्ता उठाने में बहुत अच्छा ...

इंतजार

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                                                                                                                            मन ही मन यही सोचती मेरी क्या गलती है भगवान.. एक परिवार था परिवार बहुत ही सुंदर और बड़ा मगर कमाने  (नौकरी.)  वाली कहे तो घर को "सिर्फ एक महिला" चला रही थी इस परिवार में तीन भाई दो बहन एक बूढ़ी  माँ   बड़ी बेटी के दो बच्चे और दामाद थे I माँ बेटी दामाद के पास ही रहती थी सब ठीक चल रहा था मगर कहने के लिए ठीक चल रहा हैं घर के अन्दर कोई दुःखी भी थी,पर परिवार में किसी को कुछ पता नहीं था की वो अंदर ही अंदर घुंट रही थी वो किसको बोले कौन सुनता उनकी बात.. परिवार को किसी तरह बड़ी बहन चला रही थी मगर वो सुखी नहीं थी I सिर्फ काम किये जा रही थी और अंदर ही अंदर...