बस्ता

                      

किसी के पीठ में बस्ता किसी के कंधे में और किसी के सर पर बस्ता

बस्ता मतलब आप लोगों को क्या लगता हैं,कौन सी बस्ते के बारे हम बोल रहे है थोड़ा दिमाग लगायें की मैं क्या बोलना मतलब लिखना चाहता हूँ I आप सोच रहे है कि बस्ता मतलब स्कूल का बस्ता..

मतलब कुछ भी निकाल सकते हैं मगर यह बस्ता बहुत ही अलग तरह का है I यह जन्म से लेकर मृत्यु तक आपके साथ यह बस्ता चलता रहता हैं I मगर लोग कुछ और ही समझते हैं,वास्तविक में बस्ता हमारी जिंदगी में बहुत कुछ सीखा कर जाते हैं और यह हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित भी करता रहता हैं और हम इस बस्ता को मृत्यु तक ढोते रहते हैं I

तो आपको बताता हूँ आखिर किस बस्ते के बारे मैं कहना चाहता हूँ I

बचपन में हम गाँव के पाठशाला जब जाते थे तो हाथ में ही किताब कॉपी हुआ करता था,कुछ बच्चे थैला में भी किताब कॉपी ले के आते थे,पहली से चार तक हाथ में ही किताब कॉपी ले जाया करते थे,परन्तु अब तो पहली कक्षा से ही बस्ता दे दी जाती है और इस बस्ते की वजन बहुत ज्यादा नहीं थी हाँ बस्ता उठाने में बहुत अच्छा लगता था की हम भी भाई स्कूल जा रहे है,समय के साथ साथ उपर की क्लास में जाने पर धीरे धीरे बस्ता का वजन बढ़ने लगा लेकिन उपर के क्लास में जाने पर बस्ता का वजन भारी तो हुआ,नयी किताबें होने की वजह से बस्ता का वजन भारी था मगर अच्छा लगता था,की मेरे पास नयी नयी किताबें है मतलब की सब भूल जाते थे की बस्ता भारी हैं,वह समय भी क्या था सभी को सुंदर लगता था I चौथी क्लास के बाद बस्ता भारी होने लगा और हम सोचते थे कब परीक्षा होगा और बस्ता हल्का होगा I लेकिन धीरे धीरे बस्ता का वजन बढ़ता गया I जब पढ़ लिख कर कुछ काबिल हो गए तो एक अच्छी नौकरी की तलाश शुरू हो गयी और इस बस्ते में सारी डिग्री और योगता ले के नौकरी के लिए कभी इस कम्पनी कभी उस कम्पनी में तलाश करते रहते और सोचते की कब एक अच्छी सी नौकरी लगेगी दस से पांच नौकरी करूँगा और अपने हिसाब से मौज मस्ती करूँगा छुट्टी में खूब घूमूँगा मजे करुंगा I उस समय सोचने में और बोलने में बहुत मजा आता था I मगर घर का दबाव आते ही सारी मौज मस्ती जैसे एक बस्ते में चली गयी और पापा मम्मी कहने लगे,की पढ़ाई तो कर ली अब कोई नौकरी भी कही कर लो,दो बहनें है उनकी शादी भी करवानी हैं I पिताजी की कुछ सहायता करो I क्योंकी पिताजी सेवानिवृत्त होने वाले है,उससे पहले कुछ कर लो I ये बात सुन के लगा की अब मेरे उपर एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी आ रही हैं I

एक बस्ता और था जो सबसे भारी था,वह था “पापा का बस्ता” बहुत ही भारी I क्योंकी वह परिवार के सभी लोगों को ले कर चल रहे थे,सभी की जरूरत को ध्यान रखना सभी का पढ़ाई लिखाई,रोटी कपड़े बच्चो के पढ़ाई के खर्चे,मास्टर के फ़ीस,घर के राशन और घर के किराये I किसी की तबियत ख़राब हो जाये तो इलाज के खर्चे,यह था सबसे भारी बस्ता जो घर के पापा उठा रहे थे I हमें तो कोई चिंता ही नहीं थी हम तो मौज मस्ती कर रहे थे पापा के पैसें से मगर सोचने वाली बात थी I हम सोचते थे की हमारा बस्ता तो बहुत ही भारी है,मगर पापा का बस्ता का क्या कहना I 

पापा का सेवानिवृत्त और घर वाले की यही तनाव से कंधे पर एक अलग सा बस्ता टंग गया जो शायद कभी उतरेगा या नहीं कुछ मालूम नहीं था पढ़ाई लिखाई का बस्ता तो एक दिन हल्का हो गया मगर अब नौकरी की बस्ता कंधे पर टंग गया जो काफी भारी थी I पापा का सेवानिवृत्त होने पर कंधे पर एक बहुत ही जिम्मेदारी वाली बस्ता टंग गया जो और बस्ते से काफी (अलग) भारी थी I 

हमें यह नहीं पता चला की कब बस्ता हल्का था,यह तो दिन प्रतिदिन बस्ता भारी ही होता गया I लेकिन जब स्कूल से लेकर नौकरी तक का सफ़र तय किया तो समझ में आया की स्कूल का बस्ता भले ही भारी था,मगर जिम्मेदारीयां बहुत कम थी और ये जिम्मेदारीयों वाली बस्ता बहुत भारी है I ज्यादातर गरीब और मध्यम वर्ग के परिवार में बस्ता एक दुसरे के कंधें पर चढ़ता उतरता जाता हैं I जैसे पापा का बस्ता,फिर बेटे का बस्ता,फिर बेटे के बेटे का बस्ता इस तरह यह बस्ता परिवार में एक कंधे से दुसरे के कंधे में चढ़ता गया,अगर माँ बाप का साया ना हो तो बस्ता और भी भारी,बुरा वक़्त में बस्ता उससे भी ज्यादा भारी हो जाता हैं I

 "बस्ते को हल्का कहे या भारी वास्तविकता में बस्ता है भारी”


Blog: Badal Goswami

                                                                                         ..OSR..

टिप्पणियाँ

  1. basta story.. ye sbhi logo ki baste ki kahani hain bahut aacha laga padh kr.good aise hi likhte rahiye

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