फ़ेरीवाला

    सफ़र जो रुकती नही..                                                                                                                                            

          आप कभी लोकल ट्रेन में सफ़र किये हैं ट्रेन स्टेशन में आने वाली होती हैं तो स्टेशन में बहुत भीड़ धक्का मुक्की लगी होती हैं I किसी को नौकरी के लिए जाना होता है तो किसी को साक्षात्कार के लिए जाना होता हैं तो किसी को डॉक्टर से मिलना होता हैं तो कोई स्कूल,कॉलेज मतलब नाना प्रकार की जरूरतों के लिए लोकल ट्रेन में सफ़र करते हैं I जब इस नम्बर की ट्रेन उस प्लेटफार्म से जाएगी तो लोगों में बहुत हरकंप मच जाता हैं लोग भागते हैं प्लेटफार्म की तरफ और गिरते परते अपनी ट्रेन पकड़ लेते हैं और अगर छुट जाये तो बहुत मुसीबत हो जाएगी क्योंकी फिर आधे घंटे के बाद फिर ट्रेन मिलेगी इस मुसीबत से बचने के लिए लोग सुबह की पहली ट्रेन पकड़ना चाहते हैं जिससे की वह समय पर नौकरी पर पहुँच सके I लोकल ट्रेन में चढ़ने की लोगों में बहुत पागलपन होती हैं और हो भी क्यों ना ये हर स्टेशन में रुक रुक कर चलती हैं और लोकल ट्रेन चलती भी बहुत तेज मिनटों में आपको अपने गंतव्य स्थान में पंहुचा देती हैं पांच मिनट में यहाँ दस मिनट में वहाँ अधिकतर लोग दफ्तर समय पर पहुँच  जाये I फिर वही भीड़ शाम को लोकल ट्रेन में देखने को मिलता हैं क्योंकी लोग दफ्तर से घर को लौटते हैं तो कोई कॉलेज से तो कोई हॉस्पिटल से तो कोई तो कोई रिश्तेदार के यहाँ से तो कोई स्कूल से लौटते हैं घर जाने को लोकल ट्रेन में बहुत तरह के लोग सफ़र करते हैं और यह एक दिन का सफ़र नहीं हैं यह रोज इसी तरह भीड़ रहती हैं आप कभी लोकल ट्रेन की सफ़र करना और देखना प्लेटफार्म में भीड़ जैसे मेले की तरह लगी रहती हैं सभी को इंतजार रहता हैं पहले चढ़ने की नहीं तो भीड़ के चलते ट्रेन छुट ना जाये I इस प्रकार यह सफ़र रोज चलता रहता हैं भीड़ लगाती रहती हैं लोग आते जाते हैं सब अपना अपना काम करते हैं हर स्टेट में इस तरह की लोकल ट्रेन चलती हैं और इसी तरह भीड़ लगती हैं I                                                         
        आज एक "मैजिक मैन" की कहानी सुनाता हूँ,इसे सभी लोगों ने लोकल ट्रेन में देखा होगा यह लोगों को अपने ऊपर आकर्षित करते हैं अपनी बातों से तो कोई गाना गा के तो कोई बजा के मतलब आप एक बार उसके ऊपर नज़र जरुर डालते हैं यह आपको सफ़र में वोर (ऊबने) नहीं होने देता हैं टाइम पास कराता रहता हैं और लोकल ट्रेन में लोग बहुत मजे से देखते भी हैं I टाइम पास के साथ बहुत से खाने के चीज भी ले के चलते हैं और खाने के जो भी चीज हैं उनके पास बहुत ही जायकेदार और चटपटा होता हैं,लोकल ट्रेन के सफ़र में सभी चीजों का लुफ्त लोग उठाते हैं I

   

               स्टेशन में लोगों की भीड़ लोकल ट्रेन का इंतजार हो रहा हैं तभी घोषणा होती हैं की ट्रेन आ रही हैं प्लेटफार्म नंबर पांच पर लोग तैयार हैं ट्रेन आकर रुकती हैं लोग जल्दी जल्दी ट्रेन में चढ़ जाते हैं लेकिन ट्रेन में पहले से ही भीड़ थी फिर भी जिसको जहाँ जगह मिला खड़े हो गये तो किसी को सीट मिली तो बैठ गये कुछ लोग तो जो सीट में बैठें होते हैं उनसे पूछते हैं,आप कहाँ तक जाओगे फिर वह उस सीट के पास खड़े हो जाते हैं जैसे ही अगले स्टेशन में गाड़ी रुकती वह आदमी उठ जाता हैं और खड़ा आदमी उसके सीट  पर बैठ जाता हैं और यह सिलसिला लोकल ट्रेन में चलता रहता हैं I जब ट्रेन अपनी गति में चलती रहती तो तभी एक आवाज आती हैं 
      मैजिक मैन की "काली मसाला चाय देशी चाय जो पियेगा ताजा हो जायेगा इस चाय में घर की पीसी हुई मसाला हैं पीयो तो जाने अगर ना आपकी थकान मिटा दे तो पैसे मत देना" 
    फिर लोग लाओ भाई एक चाय दे दो चाय में नीबू,मसाला डाल कर आपको देगा जब आप पियोगे तो आप इतना ताजा अपने आप को महसूस करोगें और मन ही मन यही कहोगें यह चाय मैं पहली बार पीया हूँ इतना एनर्जेटिक मुड फ्रेश कर दिया I तभी एक आवाज आई "टाइम पास" सिर्फ पांच रूपये में टाइम पास खाओगे तो याद करोगें बहुत ही चटकदार मसालेदार भुना हुआ चना दाल,मटर मसाला और मुरमुरे,लोग अरे भाई टाइम पास इधर आना क्या लोगों हींग वाली चना मसाले वाली मटर या फिर चटपटा मुरमुरे इस तरह से फेरीवाला अपना खाने और भी जरूरत की चीजें लोकल ट्रेन में बेचते रहते हैं,सफ़र में ट्रेन चल रही हैं और आप चटपटा चटकदार चीज खाने में बहुत मजा आता हैं फिर आया खीरा वाला ले लो देशी खीरा वो भी पांच से दस रूपये लेते हैं जब वह खीरा में वो जायकेदार मसाला डालते हैं ना आप खा के वाह वाह जरुर करोगें उनकी मसाला बहुत जायकेदार होता हैं I ट्रेन अगले स्टेशन में पहुंचते ही फिर आवाज आई गरमा गर्म समोसा ले लो एक दम घर का बना हुआ दस रूपये में दो समोसा चटनी धनिया की घर की पीसी हुई फिर लोग आवाज़ लगाते हैं भाई मुझे दो समोसा दो I  
          इस प्रकार लोकल ट्रेन में बहुत कुछ बेच के ये गरीब फेरीवाला अपने परिवार का जीवन चला रहे हैं मगर इनको कितना मेहनत करना पड़ता हैं भाग दौड़,धक्का मुक्की लोकल ट्रेन के पीछे भाग भाग के इनके पैरों में छाले तक पड़ जाते हैं I जितने भी फेरीवाले इनकी जीवन बहुत ही दुःख और कष्ट की जिंदगी हैं लोगों की बातें सुनना लोगों के पास गिरगिराना अपने सामान को बेचने के लिए कितने लोग तो उन्हें दुत्कार भी देते है इन जिंदगी का एक हिस्सा बन चूका हैं I  
                  एक बार मैं लोकल ट्रेन में सफ़र कर रहा था मैंने देखा की फेरीवालें अपना सामान बेचने के लिए कितना मेहनत कर रहे हैं कोई ऐसे आवाज़ लगा रहे हैं तो कोई गाना गा के आवाज़ लगा रहा हैं की भाई साहेब आपको दूँ क्या बहुत ही मजेदार हैं ये खाने में,कुछ लोग ले लेते है तो कुछ लोग मना कर देते हैं I लेकिन ये चलती ट्रेन में ऐसे ही आवाज़ लगा लगा के सारा दिन कमाने में निकाल देते हैं फिर जा के कुछ पैसे कमाते हैं I मैं जब सफ़र कर रहा था तो ये सब देख के मुझे बहुत दुःख हुआ कितना मेहनत करते हैं मैंने सोचा क्यों ना इनपे एक कहानी लिखूं मैं बहुत ही छोटे छोटे गरीब लोगों की कहानियां लिखता हूँ,बड़े बड़े लोगों के ऊपर कहानियां तो सभी लिखते हैं,आपने देखा होगा ट्रेन में फेरीवाला क्या क्या बेच रहे I लेकिन इनकी हकीकत में कहानी क्या हैं कैसे सारा दिन आवाज़ लगा लगा कर एक ट्रेन से दुसरे ट्रेन में घूम घूम कर सामान बेचते हैं I  
               मैं जब लोकल ट्रेन में सफ़र कर रहा था तो मैंने एक फेरीवाला से चलती ट्रेन में कुछ खाने को लिया और उससे जल्दी जल्दी बात करने लगा पहले तो बात करने से मना कर दिया मैंने बोला भाई तुम लोग इतनी मेहनत करते हो मुझे कुछ बताओ अपने बारे में मगर वो कुछ भी नहीं बोला,आवाज़ लगता हुआ आगे चल दिया I मैंने सोचा ये बात करेगा परन्तु अभी सामान बेच रहा हैं इसलिए बात नहीं करना चाहता हैं,देखता हूँ थोड़ा भी खाली होगा तो बात कर लूँगा तभी एक स्टेशन में लोकल ट्रेन रुकी वो उतरने लगा मैं भी उसके साथ उतर गया और उसके पीछे पीछे चलने लगा वह रेलवे स्टेशन की लोहे वाली लम्बी कुर्सी में बैठा फिर मैं भी उसके बगल में बैठ गया वह पहचान गया बोला अरे बाबु आप मेरे पीछे पीछे आ गए फिर काफी बातचीत हुई I फेरीवाले ने बोला क्या बताऊँ अपने बारे में हमारा तो नसीब ही ख़राब हैं घर की रोटी के लिए हमलोगों की जिंदगी ट्रेन की तरह भागते भागते कब जवानी से बुढ़ापा आ जाता हैं पता ही नहीं चलता मुझे उसकी बाते सुन कर बहुत दुख हुआ मैंने बोला चोरी तो नहीं कर रहे हो खुद मेहनत कर के अपने परिवार को रोटी दे रहे हो ये तो अच्छी बात हैं मेहनत की कमाई खा रहे हो इससे बड़ी बात क्या हो सकता हैं I मैंने एक दो सवाल किया उसने कहा कुछ लोग सामान बाजार से ला के थोड़ा ज्यादा दाम में ट्रेन में बेचते हैं और हमलोगों में बहुत से लोग ऐसे हैं वह अपने घर से खाने के सामान बना के लाते हैं जैसे भुना हुआ चना दाल,मटर,पापड़,समोसा और भी बहुत से चीज हैं जो खुद बना के छोटा छोटा पेकेट तैयार कर के ट्रेन में बेचते हैं बहुत ज्यादा कमाई नहीं हैं और जितने भी खाने के सामान हम बनाते हैं हमारी घरवाली,बच्चें हम लोग मिल कर बनाने का काम करते हैं I               
         हमलोग सुबह ४ बजे उठकर चना,मटर,मुरमुरे,पापड़,मूंगफली और भी बहुत सारी चीजें खाने के भुन कर मसाला खुद के हाथों से पीस कर जायकेदार बना कर मिलाते और छोटे छोटे पेकेटें बनाते हैं हमारे खाने के सामान में कोई नाम नहीं होता हैं बस ये जायकेदार होता हैं लोगों को खा के मजा आता हैं,सुबह ७ बजे वाली पहली लोकल ट्रेन में चढ़ते हैं वही से हमारी शुरू हो जाता हैं सफ़र सामान बेचने का,इस तरह एक ट्रेन से दुसरे ट्रेन चढ़ते फिर इसी लोकल ट्रेन से दस बजे रात को वापसी होती हैं हमारा जो भी सामान बिक जाता बीबी बच्चें जहाँ से हम लोकल ट्रेन में चढ़ते हैं वहां से घर के लिए निकल जाते हैं I इस तरह हमलोग दिनभर मैं चार या पांच बार लोकल ट्रेन में उप डाउन हो जाता हैं I हमारा घर इस स्टेशन से दो स्टेशन आगे हैं हमलोग बहुत गरीब हैं इसी फेरी से हमारा घर चलता हैं कमाने की बात रोज एक हजार तो कभी दो हजार कमाते हैं कुछ पैसे हमें पुलिसवाले को भी देना पड़ता हैं सात बजे इसलिए जाते हैं क्योंकी सुबह चार बजे उठाना पड़ता हैं सामान तैयार करना पड़ता हैं I इस प्रकार हमारा घर चलता हैं बच्चों को स्कूल भेजते हैं जो बच्चा पढना नहीं चाहता वह इस काम में लग जाता हैं अब किसी को मार पिट के पढ़ाया तो जा नहीं सकता अब हम मियां बीबी क्या करे बच्चें कोई गलत लाइन में चल जाये इसलिए ज्यादा दवाब नहीं देते हैं और जो पढ़ना चाहता हैं उसको पढ़ाते हैं मगर हमारे बच्चें कहाँ ज्यादा पढ़ पाते वह थोड़े डॉक्टर,आईपीएस या आईएस बन पाते हैं थोड़ा पढना लिखना और हिसाब किताब करना आ जाये यही बहुत हैं, हाँ बहुत से हमारे यहाँ के बच्चें प्राइवेट में नौकरी कर रहे हैं I हमारे परिवार के अधिकतर लोग यही काम करते हैं सब इसी लोकल ट्रेन में फेरी करते हैं कोई छोटे छोटे कपड़े,कंघी,तेल,ताला चाभी,और जूते चप्पल,मोज़े,चैन लॉक इस तरह के सामान बेचते हैं I हमलोग फेरीवाले सुपर फ़ास्ट ट्रेन में नहीं चढ़ते हैं क्योंकी हमारा सामान कम दामों का और रेलवे पुलिस चढ़ने नहीं देते हैं स्टोपेज बहुत कम होती हैं ट्रेनों की और अगर गलती से चढ़ जाये तो सारा सामान जप्त हो जाता हैं I इसलिए हमलोग फेरीवाले लोकल ट्रेन में सामान बेचते हैं और लोकल ट्रेन में अधिकतर काम काज और लोकल लोग सफ़र करते हैं हमारे पुरखें भी लोकल ट्रेन में इसी तरह सामान बेचते थे I हम फेरीवाले आपस में कभी भी ट्रेन में लड़ाई झगड़ा नहीं करते हैं क्योंकी सबकी रोजी रोटी ट्रेन के मुसाफिरों से चलती हैं I
      पहले हम फेरीवालों को लोकल ट्रेन में चढ़ने नहीं दिया जाता था,लेकिन कुछ सालों से सरकार हमें ट्रेन में चढ़ने की अनुमति दी हैं,पहले तो हम ट्रेन की खिड़की से ही सामान बेचते थे और ट्रेन के साथ साथ दौड़ते रहते थे इससे कभी कभी सारा सामान के साथ प्लेटफार्म में गिर भी जाते थे I लेकिन भगवान का शुक्रिया अदा करते हैं की रेलवे ने अब हम फेरीवालों को ट्रेनों में सामान बेचने की अनुमति दे दी हैं और इसके एवज में फेरीवालों को १५०० सौ रूपये देने पड़ते हैं और यह केवल १५ दिनों तक ही ट्रेनों में सामान बेच सकते हैं I यह योजना स्थानीय घर के बनाये हुए उत्पादों से यात्रियों को परिचित कराने में मदद और स्थानीय व्यवसायों और क्षेत्रिय व्यंजनों को बढ़ावा देने के उद्देश से किया गया हैं,जिससे वह अपना सामान बेच सके और अपना घर परिवार चला सके I इनको कई नामों से लोग बुलाते हैं I
  "चायवाला,चनावाला,खीरावाला,चिप्सवाला,ताला-चाभीवाला,जुतापोलिसवाला,लवनचूसवाला और ना जाने इनको कितने नामों से बुलाते हैं मगर असल में नाम किसी को पता नहीं इनको ट्रेन में फेरीवाला या होकर बोल के बुलाते हैं"

Blog : Badal Goswami

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