त्याग

 

                                   

          "बाबा आप की कृपा अपरमपार हैं आप महान हो साईं" 

       बहुत समय पहले की बात हैं ये बात कोरोना काल की हैं सन २०२१ मार्च की बात हैं कोरोना चाइना से भारत में शुरुआत हुई थी एक साधारण सा परिवार किसी तरह से पैसे की व्यवस्था कर के शिर्डी जाने की तेयारी कर रहे थे ये परिवार शिर्डी साईं बाबा से बहुत लगाव था ये लोग बाबा को बहुत मानते हैं इनकी आस्था बाबा पर बहुत थी कोई भी काम करने से पहले शिर्डी साईं बाबा से आशीर्वाद ले के करते थे और बाबा भी इनकी बात सुनते और कोई विपति आने से पहले इन्हे आगाह कर देते थे ये छोटा सा परिवार बाबा को बहुत मानते हैं इस परिवार में मियां बीबी और एक बहुत सुंदर सी इनकी एक बिटिया हैं बिटिया भी बाबा को दादू बोलते थे I मम्मी दादू से मिलने शिर्डी कब हमलोग जायेंगे माँ बोलती, बेटा पापा पैसे की इंतजाम कर रहे हैं फिर हम लोग जायेंगे ऐसे कह कर बिटिया को सातवाना देते थे बिटिया भी चुप हो जाती थी की पापा हमलोगों को ले जायेंगे खूब मजे करेंगे शिर्डी में..

       समय बिताता जा रहा था किसी तरह बहुत कम पैसे की व्यवस्था हुई और टिकट बनी १६ मार्च २०२१ को जाने की और १९ मार्च २०२१ को वापसी आने की हुई चार दिन की टिकट बनी बहुत कोशिश करने पर ये लोग चाहते थे सात दिन की टिकट आखिर सभी लोग जाने की तेयारी कर रहे थे I वो दिन आ ही गया बाबा ने सारी व्यवस्था अंदर ही अंदर कर दिए थे, ईश्वर कभी बोल के कोई काम नहीं करते I हमलोगों को पता हैं किसी के द्वारा करवा देते हैं मगर करते जरुर हैं, कहते है ना की... 

उपर वाले के यहाँ देर हैं अंधेर नहीं

       मियां बीबी और बिटिया को ले के शिर्डी पहुंचे यहाँ की वातावरण बहुत अच्छी थी ये लोग पहुँच कर होटल लिए फिर सारे परिवार नये नये वस्त्र पहन कर बाबा के दर्शन किये, बिटिया सबसे ज्यादा खुश थी क्योंकी उसके दादा दादी इस दुनिया में नहीं थे और बिटिया को वो प्यार नहीं मिला तो वो हमेशा साईं बाबा को ही अपना दादू समझती थी जयकारा लगा के बाबा के मंदिर में प्रवेश किये बाबा की वो सुबह वाली तरो ताजी मुख को देख कर ऐसा लग रहा था की वो इसी परिवार का  इंतजार कर रहे हैं बिटिया तो बहुत छोटी हैं वो बोली पापा मुझे गोद में लो मुझे दादू दिख नहीं रहे है मुझे दादू को देखनी हैं फिर बिटिया ने हाथ जोड़ कर बाबा को प्रणाम किये चन्दन के तिलक लगाये सभी ने दर्शन करने के बाद ये लोग प्रशाद लिए और मंदिर के चबूतरे में बैठ कर प्रशाद खाये फिर सारे परिवार मंदिर की परिक्रमा किये फिर बाहर आ कर नाश्ता किये,फिर घूम फिर कर होटल चले गए I   

       सारे लोग बहुत खुश थे इसी तरह दो दिन बीत गए फिर तीसरे दिन इन्होनें बिटिया के हाथो से प्रसाद बटवाए,चोथे दिन इनको वापिस आना था ये लोग और दिन रुकना चाहते थे मगर बाबा की खेल कुछ और ही थी इनकी टिकट चार दिन की ही बनी थी बहुत कोशिश किये थे एक हप्त्ते के लिए मगर इसके पीछे बाबा का क्या मकसद था चार दिन की ही टिकट बनी ये तो बाबा ही बता सकते हैं ना बनी चार दिन से आगे की टिकट.. 

       कहावत हैं "जाको राखी साईंया मार सके ना कोई" ये इस परिवार पर एक दम फिट बैठता हैं I 

 पहली घटना...       

       चौथे दिन इनको वापिस आना था चलो एक बार फिर बाबा का दर्शन कर लेते है पता नहीं फिर कब आना हो पुरे परिवार बाबा का दर्शन किये और मंदिर से बाहर आ गए बिटिया की मम्मी और पापा एक होटल में खाना खाने के लिए गए मगर यहाँ एक बात हो गयी I 

        इनकी बीबी को "नॉन वेज" (non-veg) खाने का मन कर रहा था वो भूल गयी की वो शिर्डी में हैं तभी पति बोला क्या क्या हुआ कुछ सोच रही हो कोई बात हैं क्या बताओ.. वो बोली मैं कहाँ हूँ पति बोला तुम शिर्डी में हो मुझे कुछ नहीं खाना हैं आप लोग खाओ पति बोला कुछ खा लो सुबह से भूखी हो, बोली नहीं खाना पति को कुछ समझ नहीं आ रहा था क्या हो गया I बीबी मन ही मन यही सोच रही थी की मैंने ये बात कैसे सोच लिया वो भी शिर्डी में.. वो मन में बाबा को पुकारने लगी बाबा मुझसे ये कैसी गलती हो गयी मैं कुछ समझ नहीं पा रही हूँ मुझे माफ़ कर दीजिये और रोने लगी मगर अपने पति को कुछ भी नहीं बताई पति बोला अरे क्या हुआ क्यों रो रही रही हो मुझे बताओ वो बोली कुछ नहीं ऐसे ही रोना आ गया I कोई नहीं बाबा हमारे साथ हैं परेशान मत हो, मगर उनकी बीबी अन्दर ही अन्दर बहुत दुखी थी और मन ही मन यही बोल रही हैं की ये बात मेरे मन में कैसे आई I फिर उन्होंने मन ही मन "प्रतिज्ञा" ली की बाबा आज से मैं "नॉन वेज" कभी नहीं खाऊँगी ये मेरा प्रतिज्ञा हैं I लेकिन इनके पति को ये सब मालूम नहीं था की वो प्रतिज्ञा ले चुकी हैं I 

        फिर ये लोग अपने घर आ गए लेकिन अभी भी उनके पत्नी के दिमाग से ये बात उतरी नहीं  की कैसे शिर्डी में ये बात मेरे मन में आया I इनके पास बहुत कम पैसे होने की वजह से कुछ खरीद नहीं पाये सिर्फ बाबा की एक छोटी सी पत्थर की मूर्ति ली बिटिया के लिए कुछ खिलोनें और प्रशाद I

दूसरी घटना...

        ये परिवार १९ मार्च २०२० को अपने घर पहुंचे सब थके हुए थे दुसरे दिन २० तारीख को गुड़िया के पापा को काम पर भी जाना था क्योंकी टिकट चार दिन के ही मिले थे सभी लोगों ने आराम किये और प्रसाद अपने परिचितों को बांटे कुछ प्रसाद गुड़िया के पापा को दिये दफ्तर के लिए, इस तरह से दिन बिता I २० मार्च को गुड़िया के पापा अपने दफ्टर पहुँचे सभी को बाबा का प्रसाद दिए अपने काम में लग गये, दिन का काम ख़त्म करने के बाद एक दिन अचानक से करीब दोपहर १.३० बजे दफ्तर के मुख्य अधिकारी ने एक मीटिंग बुलाई की सभी कर्मचारी को मीटिंग में आनी हैं कुछ जरुरी बातें करनी हैं अधिकारी ने कहा २४ मार्च मतलब कल से दफ्तर २१ दिनों तक कोरोना वायरस की महामारी को रोकने के लिए भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदीजी ने पुरे देश को लॉकडाउन रहने का आदेश दिये ये सुनते ही कुछ कर्मचारी खुश हुए तो कुछ नाराज क्योंकी आराम में कही पैसे ना कट जाये और खुश की चलो एक महीना आराम मिला I शाम को दफ्तर में २१ दिन के लिए ताला लगा दिया और कहा आप लोग अपने अपने घर जाये और घर से काम कीजिये कब दफ्तर खुलेगी आप लोगों को फ़ोन से सूचित किया जायेगा I 

        गुड़िया के पापा घर आ गए पत्नी बोली आज बहुत जल्दी आ गए क्या हुआ आज छुट्टी जल्दी हो गयी क्या ? पति बोला नहीं देश में कोरोना महामारी फैल गयी हैं इसलिए दफ्तर २१ दिनों के लिए बंद कर दिया गया हैं प्रधानमंत्री ने आदेश दिए की सभी स्कूल कॉलेज और जितने भी छोटे बड़े दफ्तर हैं सभी बंद रहेंगे और जो लोग जहाँ हैं वही रुक जाये क्योंकी रेल,बस जो भी यातायात की व्यवस्था  सभी बंद रहेंगे जब तक कोरोना महामारी कम ना हो जाये, पत्नी बोली ये कैसी बीमारी आ गयी हैं जो पूरा देश बंद रहेगा I पत्नी चुप चाप भगवान के मंदिर के पास जा कर हाथ जोड़ कर खड़ी हो गयी और कुछ बोल नहीं रही थी पति बोला क्या हुआ उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था फिर थोड़ी देर बाद पत्नी बोली देखो बाबा हमारा कितना ख्याल रखते है पुरे परिवार को सुरक्षित घर भेज दिए हैं और तुम्हारा टिकट भी उसी तरह बना था आप कितना कोशिश किये मगर चार दिन की ही टिकट बनी थी याद हैं ना ये सब बाबा की कृपा हैं जो आज हम लोग यहाँ हैं सुरक्षित घर आ गए हैं I हमलोगों के आने के दो दिन बाद देश में लॉकडाउन लग गया हैं अगर हम लोग शिर्डी में रहते और लॉकडाउन लग जाता तो क्या करते बिटिया को ले के कहाँ जाते पैसे भी तो नहीं थे खाते कहाँ से, लोगों से  मांगना पड़ता जिन्दा रहने के लिए फिर कब घर आते I मैं तो सोच सोच कर परेशान हो रही हूँ बाबा की अशीम कृपा हैं की आज हम लोग जिन्दा हैं और स्वस्थ हैं इस तरह पति पत्नी दोनों ने बाबा के सामने हाथ जोड़ कर बाबा आप ने हमें धक्का दे के घर भेजा हैं ये हम लोग समझ नहीं सके I

              "बाबा आप की कृपा अपरमपार हैं आप महान हो साईं" 

इस तरह बाबा ने इस परिवार की जान बचाई I

        माछ (fish) भात खाने वाली बंगाली लड़की माछ (fish) को त्याग दी लोगों को क्या पता उसने क्यों त्याग दी I लोग देखते हैं तो बोलते हैं वो देखो माछ (fish) भात आ गई जरुर आज माछ (fish) भात खा के आई होगी I वो एक स्कूल में पढ़ाती हैं बहुत सारे शिक्षक और कर्मचारी है इन लोगों को क्या पता की वह नॉन वेज (non-veg) को त्याग चुकी हैं ढाई साल हो चूका हैं वो जीती हैं परिवार के लिए उसके लिए परिवार सबसे पहले हैं ना की अपने सुख के लिए परिवार को किनारे कर दे इसे कहते हैं त्याग..

        एक बात और वो आज भी जी रही हैं लोगों के ताना के साथ मगर उसको कोई फ़र्क नहीं पड़ता की कौन क्या बोल रहा हैं उसके लिए परिवार पहले हैं और पहले रहेगा I चमड़े का मुहं है लोग कुछ भी बोल सकते हैं..   

                            

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                                                                 ...OSR...

        

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