"मुन्ना" से मंगरू..
बादल गोस्वामी
कुछ अलग कहानिया.com
पढ़ने का समय : 4 मिनट
"घर में सब उसे मुन्ना कहते थे,माँ की आँख का तारा, मुन्ना I "💔
यह कहानी एक गरीब परिवार की हैं, परिवार में बड़ा लड़का मुन्ना 12 साल का और दो छोटे भाई, बहन और माता पिता थे,गाँव में ठीक - ठाक जीवन चल रहा था I लेकिन कुछ दिनों से गाँव में काम की बहुत कमी होने लगा I लोग बहुत परेशान होने लगे, क्योंकि गाँव में कोई उद्योग धंधा नहीं था, लोग खेती से ही अपने परिवार का जीवन चला रहे थे I काम - धंधा ना मिलने के कारण, छोटे छोटे बच्चों का शिक्षा और परवरिश करना बहुत मुश्किल हो रहा था, काम की तलाश में मुन्ना के परिवार शहर आ गए I शहर तो आ गए मगर रहने के लिए जगह ढूंढने लगे, जगह मिल रहे थे, मगर बहुत ही महंगा उतना पैसा नहीं था, थक हार कर मुन्ना के माँ बापू झुग्गी में सहारा लेना पड़ा I शहर में काम नहीं मिला I आखिर थक हार कर परेशान हो गये, उन्हें बस दो वक्त की रोटी मिल जाये इसी की तालाश थी I
माँ बाप की मजबूरी :
कुछ दिनों के बाद वह जिस झुग्गी में रहते थे, वहाँ के लोगों से मुन्ना की माँ ने कहा आप लोग काम पर जा रहे हो हमें भी कुछ काम दिलवा दो, हमारी हालत बहुत ख़राब है I लोगों ने कहा हमारे साथ चलो, हम चौधरीजी से बोल के तुम्हें काम पर लगवा देंगे I आखिर उन्हें काम मिल गया "मजदूरी" सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे, वह रोज दिनभर बालू, सीमेंट, लोहा और ना जाने कितने सामान ढोते थे, शाम तक दोनों के शरीर थक कर बेहाल हो जाते थे और फिर घर जा कर खाना बनाना बच्चों को खिलाना देख भाल करना मतलब जिंदगी एक पीड़ा बन गयी थी I
लाडला "मुन्ना"
"मुन्ना" मासूम सा बच्चा माँ का लाडला और बापू का प्यारा था I जब वह जन्म लिया था, माँ बहुत ही प्यार से कहती, मेरा लाडला एक दिन बहुत बड़ा आदमी बनेगा और हमारा नाम रौशन करेगा, हम इसे खूब पढ़ाएंगे माँ का दुलारा आखों का तारा था I गाँव में लोग "मुन्ना" को बहुत प्यार करते थे, बच्चों के साथ "मुन्ना" बहुत जल्दी घुल मिल जाता था I
"मुन्ना" माँ की कमी :
"मुन्ना" महज १२ साल का लड़का माँ बाप जब सुबह - सुबह मजदूरी के लिए निकल जाते, वह दोनों छोटे भाई और बहन की देख - भाल करता, बच्चों को नहाना, खाना खिलाना I माँ की कमी को पूरा करता, माँ "मुन्ना" के सहारे बच्चों को छोड़ जाते थे I कुछ दिनों से "मुन्ना" घर की हालत देख बहुत चिंतित मन में फ़िक्र होने लगा I वह सोचता की मेरे दो छोटे भाई और बहन का क्या होगा, माँ बापू की तरह ऐसे ही मजदूरी करेंगे क्या ?
"सवाल वह अपने आप से पूछता हैं"
इन सब हालात और मजबूरियां देख "मुन्ना" चिंता में पड़ गया I अब वह ना तो ठीक से सोता ना ठीक से खाता बेचैन रहता I माँ बापू की कमाई से सिर्फ दो वक़्त की रोटी ही व्यवस्था होती हैं, मन ही मन बुदबुदाता रहता था I १२ साल का बच्चा कितना सोचता हैं, अपने परिवार के लिये I आज हमारे देश की में महंगाई बढ़ती जा रही हैं I आप एक नौकरी से अपने परिवार को सिर्फ दो वक़्त की रोटी ही खिला सकते हैं, अगर अतिरिक्त काम ना करें तो बच्चों को अच्छी शिक्षा और ना अच्छी परवरिश दे सकते हैं I यह सब सोच कर "मुन्ना" ने झुग्गी में किरने की दुकान वाले भईया के पास गया और बोला भईया कोई काम हैं, मेरे लायक ! माँ बापू सारा दिन मजदूरी करते रहते हैं, मुझे अपने भाई और बहन को अच्छे स्कूल में पढ़ना हैं I भईया बोले तुम अभी बहुत छोटे हो,पढ़ाई-लिखाई करो तुम्हारी उम्र काम करने की नहीं हैं I "मुन्ना" चुप रहा फिर बोला भईया मेरे घर की आर्थिक स्थिती बहुत ख़राब हैं I "मुन्ना" बोला कुछ भी कर लूँगा, भईया बोले जा यहाँ से काम करने आया हैं I "मुन्ना" मायूस होकर घर चला गया I
शाम का समय था, उसने देखा उसकी माँ लगड़ा के काम से वापिस घर आ रही थी, वह कुछ समझ नहीं पाया की आखिर माँ लगड़ा के क्यों आ रही हैं I वह कुछ समझ नहीं पाया तभी उसकी नज़र पैरों पर गयी देखा माँ की प्लास्टिक की चप्पल टूटी थी I "मुन्ना" सोचने लगा कल काम पर माँ कैसे जाएगी I वह कुछ सोचा और चप्पल ले कर गली में मोची चाचा के पास गया I चाचा बोले अरे मुन्ना तुम यहाँ क्या करने आये हो, अम्मा की चप्पल टूट गयी, इसे ठीक कर दो, मोची चाचा बोले अरे "मुन्ना" यह बहुत पुरानी हो गयी हैं, ज्यादा दिन नहीं चलेगा, कोई नहीं मैं इसे सिल देता हूँ I "मुन्ना " सोचा क्यों ना चाचा को बोलूं शायद कोई काम मिल जाये,चाचा कोई काम मिल सकता हैं I मोची चाचा ने कहा अरे "मुन्ना" बेटा तुम क्या काम करोगे I कुछ पढ़ाई कर लो, तुम्हारी उम्र पढ़ाई की हैं, तुम अभी बहुत छोटे हो, "मुन्ना" कोई तो काम होगा मेरे लायक "हमेशा माँ बापू की मजदूरी दिखाती हैं, कितना मेहनत करते हैं, घर चलाने के लिए I"
माँ - बाप का साथ छूटना :
एक दिन की बात हैं, "मुन्ना" की माँ काम से घर आई I माँ बहुत खांस रही थी, घर में दवा नहीं थी I कुछ पैसे थे, घर के राशन के लिए वह सोचने लगा की ये पैसा माँ के इलाज में लगाऊ या राशन के लिए रखूं I तभी बापू घर आये बोले तेरी अम्मा की तबियत बहुत ख़राब हैं, "मुन्ना" बोला बापू माँ को डॉक्टर के पास ले जाना पड़ेगा खांसी रुक नहीं रही हैं I बापू बोले मैं तेरी अम्मा को काढ़ा बना के देता हूँ, उससे वो ठीक हो जाएगी, रात को अम्मा ठीक से सो नहीं पाई I बापू रोज सुबह मजदूरी के लिए चले जाते, "मुन्ना" घर पर माँ की देखभाल करता I मगर, माँ ठीक नहीं हुई और इसी तरह एक दिन माँ दुनिया से चल बसी I कुछ महीनों बाद बापू भी बीमारी और कमजोरी से हार गए I वह भी चल बसे I जैसे मानों "मुन्ना" का दुनिया ही उजड़ गया, वह एकदम अकेला हो गया I वह अपने दोनों छोटे भाई और बहन को देख रोने लगा I उसने अपने आप को दिल से मजबूत किया और ठाना की आज से मैं अपने भाई बहन को पढ़ाऊंगा और एक अच्छा इन्सान बनाऊंगा I
"माँ-बाप के जाने के बाद "मुन्ना अनाथ नहीं हुआ..वह एक ही रात में अपने छोटे भाई - बहन का बाप बन गया था"
छोटे भाई - बहन की जिम्मेदारी :
"मुन्ना" निराश होकर "मोची चाचा" के दुकान पर गया, चाचा कोई काम दो, चाचा बहुत दुखी थे क्या करते ? "मुन्ना" बोला घर चलाना हैं, भाई-बहन को स्कूल में दाखिला करवाना हैं I चाचा बोलें मेरे पास एक काम हैं "मुन्ना" झट से बोला बताओ चाचा क्या काम हैं I बोले यह लकड़ी का "काला बक्सा" देख रहे हो "मुन्ना" बोला हाँ, वह कुछ समझा नहीं, जब बाक्स खोला तो देखा कुछ सामान रखा हुआ हैं मगर उसे समझ नहीं आया I चाचा बोलें कुछ समझ आया "मुन्ना" बोला नहीं, मैं बताता हूँ I देखों इसमें दो ब्रश, काली और भूरे रंग और पॉलिश भी हैं, एक सफ़ेद क्रीम और एक कपड़ा हैं "मुन्ना" इससे क्या होगा, चाचा बोलें देखो कोई कस्टमर (Customer) आये तो मैं तुम्हे बताता हूँ I काफी देर बाद एक कस्टमर (Customer) आया और चाचा से बोला जुता पॉलिश कर दो I "मुन्ना" ने देखा चाचा कैसे उस काली लकड़ी के बक्सा में जो सामान था I उससे जूता में पॉलिश लगाया I फिर ब्रश से रगड़ा और अंत में एक सफ़ेद रंग की क्रीम लगाया और कपड़े से साफ़ कर दिया I जूता पॉलिश हो गया और कस्टमर (Customer) ने चाचा को २० रूपये दिए I चाचा ने "मुन्ना" की तरफ देख कर कहा कुछ समझ आया, 'मुन्ना" बोला चाचा मुझे समझ आ गया, जूता कैसे पॉलिश करते हैं I
छोटे कंधो पर बड़ी जिम्मेदारी :
सुबह की पहली किरण "मुन्ना" चला कमाने... "मुन्ना" नहा धो कर अपने दोनों भाई और बहन को नास्ता "रोटी आचार" खिला कर तीनों को पड़ोस के मुहं बोली मौसी के यहाँ छोड़ कर, चाचा के पास गया और चाचा से काली लकड़ी का बक्सा कंधे में लटका कर बाजार की तरफ निकल गया I रास्ते में जो लोग ऑफिस के लिए जाते, लोगों को कहता भईया जूता पॉलिश कर दूँ, २० रूपये दे देना, लोग कहते स्कूल जाने की उम्र में जूता पॉलिश कर रहा हैं, लोगों को लगता हैं ये बच्चा क्या जूता पॉलिश करेगा, गरीब समझ कर पॉलिश करवा लेते हैं I स्कूल जाने उम्र में अपने नन्हे - नन्हे हाथों से जूता पॉलिश कर रहा हैं I लोग उसके आगे मजबूर हो जाते हैं, खुश हो कर लोग थोड़ा ज्यादा पैसा दे देते थे I कुछ भगा भी देते, पढ़ने की उम्र में जूता पॉलिश कर रहा हैं भग जा "मंगरू" कही का हमेशा भीख मांगता रहता हैं I इस तरह लोग बाज़ार में दुखी कर देते थे I "मुन्ना" रोज बाज़ार में इसी तरह लोगों को २० रूपये दे दो पॉलिश कर देता हूँ I अब बाज़ार में लोग "मंगरू" के नाम से बुलाने लगे हैं I कभी रेलवे स्टेशन में बैठ जाता, कभी पैदल चलता और एक ही आवाज़ देता भईया पॉलिश करा लो I जब ट्रेन के बोगी में होता तो पॉलिश के ब्रश को बक्सा में मारता और आवाज़ लगता पॉलिश,साहब पॉलिश, कोई उसके बचपन के बारे कुछ भी बोलता तो चुप-चाप रहता, कुछ नहीं बोलता और वहां से चला जाता I
"मुन्ना" से "मंगरू"
बाज़ार से जब भी वो निकलता लोग "मंगरू" कह के बुलाते वो कहता भईया मेरा नाम "मुन्ना" हैं मंगरू नहीं, लोग कहते हमेशा तो मंगाते रहता हैं २० रूपये दो जूता पॉलिश कर देता हूँ इसलिए तुझे मंगरू बुलाते हैं I बाज़ार से निकलता दुकान वाले उसे मंगरू बुलाते, वह लोगों को कहता मेरा नाम "मुन्ना" हैं मगर कोई सुनता ही नहीं था I अब बेचारा क्या करता किस-किस का मुंह चुप कराता परेशान हो चूका था I कुछ दिनों के बाद मोहल्ले वाले भी उसे मंगरू बुलाने लगे I "मुन्ना" कब मर गया, पता ही नहीं चला I बस "मंगरू" रह गया...जो सबके दर पर हाथ फैलता हैं I पहले वह मोहल्ले का "मुन्ना" था I लेकिन माँ - बाप के जाने के बाद उसकी हंसी कम और जिम्मेदारियां ज्यादा हो गई I पता ही नहीं चला कि लोग उसे "मुन्ना" की जगह "मंगरू" कब से कहने लगे I
"मुन्ना" की मेहनत रंग लाई :
माँ बाप के देहांत के बाद "मुन्ना" जो भी जूता पॉलिश से कमाता उसी से भाई और बहन को स्कूल में दाखिला करवाया I "मुन्ना" को भी पढ़ने और स्कूल जाने का बहुत शौक था, वह जा ना सका, घर की जिम्मेदारी और कुछ मजबूरी थी, भाई-बहन को पढ़ाने के लिए स्कूल की फ़ीस कहाँ से लाता "मुन्ना" पढ़ ना सका I माँ - बाप के देहांत होने के बाद पहली बार "मुन्ना" ने अपने छोटे भाईयों और छोटी बहन को खाना खिलाया I उस रात "मुन्ना" खुद खाना नहीं खाया, क्योंकी उसे भूख नहीं थी I उसे जिम्मेदारी लग गई थी I
"मुन्ना" खूब मेहनत करने लगा दर - दर भटकता सड़कों पर चलता रहा, वही काली लकड़ी का बक्सा अपने कंधें में लटका के कभी सड़क में तो कभी बाज़ार में तो कभी प्लेटफ़ॉर्म में जूता पॉलिश करता रहा I लोग अब उसे मुन्ना के नाम से नहीं "मंगरू" के नाम से जानने लगे I "मंगरू" अपने काम में बहुत आगे बढ़ गया !
अब उसने बाज़ार में एक मोची की दुकान लगा कर लोगों के जूते पॉलिश और जूते सिलने का काम करने लगा I समय बीतता गया, भाई - बहन स्कूल से कॉलेज चले गए "मंगरू" मेहनत करता रहा और बच्चों के लिए अपना बचपन खो दिया I आज वही बच्चें, बड़े होकर अपनी पहचान बना चुके थे I आज "मुन्ना" के भाई - बहन उस मुकाम पर पहुँच चुके थे, जो "मुन्ना के माता - पिता का सपना था की "मुन्ना" एक दिन बड़ा आदमी बनेगा, लेकिन समय ने कुछ और ही बना दिया I जिन हाथों से कभी भाई - बहन की फ़ीस और किताबों के लिए मेहनत की, वही हाथ आज उनकी कामयाबी देखकर खुश था I
| जिसने सबको आगे बढ़ाया, खुद पीछे रह गया |
"मुन्ना" ने अपनी सारी जिंदगी कष्ट और दुःख से जिया, ताकि उसके भाई - बहन की जिंदगी आगे बढ़ सके I सब आगे बढ़ गए..
"मंगरू" अकेला रह गया..
Blog : Baadal Goswami
आप बताये "क्या हमलोग ऐसे लोगों की मेहनत को पहचान पाते हैं ?"
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...osr...

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