One "Cup" of Tea

बादल गोस्वामी osr 
कुछ अलग कहानियां.com 


पढ़ने का समय : 2 मिनट 

क्या एक "गरीब" BONE CHAINA Cup में चाय पी सकता हैं ?


यह चाय छोटे को बड़ा और बड़े को छोटा बनाया 
                     

        देश में सभी वर्ग के लोग चाय पीते हैं बड़े ही चुस्की और मजे से,चाय यह नहीं देखती की कौन बड़ा कौन छोटा,कौन अमीर कौन गरीब ये सभी जगह घुमती हैं सभी के होठों से लगती हैं चाय वही हैं मगर पद के मुताबिक प्याला "कप" अलग अलग हो जाता हैं I

"Cups gets separated according to positions"

       चाय का नाम सुनते ही मन में एक ताजगी सी आती हैं और क्यों ना आये चाय चीज ही ऐसी हैं की सुनने के बाद ये पीने का मन करता हैं, कब चाय मिले उसमें भी मन में एक ही ख्याल आता हैं की वो चाय कड़क और स्वादिस्ट और सुनहरा खुशबू हो मतलब की चाय का नाम सुनते ही मन चहक जाता हैं अगर ठंड में मिल जाये तो क्या बात हैं, सोने पे सुहागा इस चाय से मस्तिष्क को ताजगी मिलती हैं और यह बहुत तेजी से काम करने लगती हैं चाय पीने के बाद सारी थकावट दूर हो जाती हैं I

        कभी कभी तो ऐसा लगता हैं की अगर सुबह चाय ना मिले तो सारा दिन ख़राब हो जाता हैं क्योंकी सुबह में जो ताजगी होनी चाहिए वो ताजगी नहीं आ पाती हैं, सुबह को अगर चाय मिल जाये तो सारा दिन का काम हो या पढ़ाई सभी काम अच्छे से हो जाते हैं I चाय भी बहुत तरह की होती हैं मीठी चाय,फीकी चाय,काली चाय,नीबूं मसाले वाली चाय,कम दूध वाली चाय ये तो चाय पीने वाले का वर्ग हैं ,इसमे गरीब हो या पैसे वाले सभी चाय की चुस्की बड़े प्यार और मजे से लेते हैं कोई कागज के कप में तो कोई चीनी मिटटी के कप में तो कोई कुल्ल्हर में तो कोई बोन चाइना के कप में चाय का मजा लेते हैं I

       चाय पीने की विविधता अलग - अलग होती हैं, ये चाय कहाँ से कहाँ हरेक पद वाले लोगों के होठों से लगाती हैं और चर्चा भी होती हैं, देश दुनिया की चाय के शोकीन भी अलग - अलग तरह के होते हैं, कभी चार दोस्त एक साथ मिल के दफ्त्टर के बाहर गरमा - गर्म  कुल्ल्हर में चाय का मजा लेते हैं तो कोई नुक्कर में कटिग चाय का मजा लेते हैं कोई बड़े - बड़े रेस्तरां में चाय का मजा लेते है कोई अखवार के साथ चाय की सुबह की शुरुआत करते हैं I 

        जिसको जैसे मजा आता, वो चाय का मजा वैसे ही लेते हैं कुछ लोग तो ऐसे होते है की वह घर से दूर चाय के दुकान जाते है, चाय पीने के लिए की अरे यार उसकी दुकान की चाय बहुत अच्छी हैं पीने के बाद मजा आ जाता हैं और चुस्की ले के पीते हैं I

सवाल चाय कि हैं... the question is about tea

      अच्छा एक बात बताये ये जो चाय हैं इसकी किस्मत क्या हैं ये जिसके पास चला जाता हैं वो उसके रंग में रम जाता हैं और जो भी पीता हैं एक ही बात मुहं निकलता हैं I क्या चाय हैं, मजा आ गया I 

        हमारे देश में चाय सबसे पहले कब आया और इसको कैसे जाना की ये कोई पीने की चीज हैं I हमारे देश के उत्तरी क्षेत्र ज्यादा समतल भी नहीं और ज्यादा पहाड़ी भी नहीं कह सकते हैं I वहाँ की मिट्टी खेती के लिए उपजाऊ हैं, क्षेत्र में काफी जंगल और बहुत हरा भरा हैं ठंड भी ठीक ठाक हैं I वहां के निवासी शुरू से ही रह रहे थे I वे लोग झाड़ियों से इस चाय की पत्ती को तोड़ कर काढ़ा बना कर पीते थे I इसके पीने के बाद शरीर में एक उर्जा सी आ जाती थी और अगर किसी को बहुत ठंड लगती तो इसे उबाल कर देते थे I 

चाय पत्ती की उत्पत्ति 

       ये उनका एक तरह से प्रयोग था की यह झाड़ियों वाली पत्ती दवा का काम करती हैं I फिर धीरे - धीरे उत्तरी क्षेत्र में वहाँ के निवासीयों ने इसे एक दवा के रूप  में इस्तमाल करने लगे I हालाकिं जंगली अवस्था में ये पहले से ही वहाँ झाड़ियों में पैदा होती थी I 

         २७०० ईसापूर्व "शेन नुंग" उनके गले में थोड़ी दिक्कत होने की वजह से वे अपने बगीचें में बैठ कर गरम पानी पी रहे थे तभी एक पत्ती उनके गिलास में गिरा तो उन्होंने देखा की गरम पानी का रंग बदल गया और उसमे से एक बहुत ही अच्छी खुशबु आ रही थी I चीनी शासक "शेन नुंग" ने उस पानी को चखा फिर वो बहुत अचंभित हुए I

पहली बार पत्ती की तारीफ  

       अरे इसकी स्वाद और खुशुबू तो बहुत लाजबाव हैं, उन्हें बहुत अच्छा महसूस हुआ और गले को राहत मिली, फिर वो उस पत्ती को रोज गरम पानी में उबाल कर पीने लगे और अपने दोस्तों को भी पिलाने लगे और शेन नुंग इसका नाम चा-आ रखा I लेकिन अभी भी इस पत्ती का नाम चाय पत्ती नहीं हुआ I 
         छठवीं शताब्धि में बौद्ध भिक्षु बौधिधर्म वाले अपनी साधना के लिए रात में ये पौधे की पत्ती को चबा कर सारी रात बिना सोये जाग कर साधना किया करते थे I इस पत्ती में इतनी उर्जा मिलती थी की बौद्ध भिक्षु रात को सोते नहीं थे तरोताजा रहते थे I 

आखिर यह पत्ती लोगों के बीच अपना स्थान बनाया 

        सन १८१५ में अंग्रेजों का ध्यान इस चाय पत्ती पर पड़ी जो असम के लोग पहले से ही इस पत्ती को पेय बनाकर पी रहे थे फिर १८२४ में चाय की पत्ती बर्मा और असम के पहाड़ियों में चाय की पत्ती के पौधे पाये गये फिर १८३४ में भारत में चाय की पत्ती अंग्रेजों ने ले कर आए I१८३६ को भारत में और १८६७ में श्रीलंका में चाय की शुरुआत  हुई I

       चाय की खेती के लिए पहले चीन से बीज आया करते थे फिर बाद में असम के बीजों का उपयोग होने लगा Iचाय की खेती पहाड़ों मे भी होती हैं और समतल भूमि में भी होती हैं पहाड़ों में सीढ़ीनुमा खेतों में होती हैं और समतल भूमि में समतल खेती होती हैं आज देखे तो चाय कितने तरह की दुकानों में आ चूका हैं I

जीवन का हिस्सा बनाना  

      अब तो हमारा जीवन बिना चाय के चलता ही नहीं हैं I किसी के सर में दर्द है तो किसी का मुड ख़राब हैं तो चलो इसको एक कप चाय पिला के लाते हैं I फिर मुड ठीक हो जायेगा मतलब कहने का की आज हमारे जिंदगी में चाय का महत्व बहुत हो गया हैं और चाय भी काफी तरह के आ चुके हैं I 

       एक से एक कम्पनी की बाज़ार में आप खुद ही असमंजस में पड़ जाओगे की कौन सी चाय सबसे अच्छी हैं मगर पीने वाले को कभी ये नहीं बोलना पड़ता की आपको कौन सी चाय पत्ती चाहिए,आज भारत चाय की पत्ती में दुनिया में दुसरे स्थान में हैं १३५० मिलियन किलोग्राम काली चाय उत्पादक हैं और घरेलु आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए आत्म निर्भर हैं I

 
        हमारा देश आज काफी आगे निकल चूका हैं ये सारा श्रेय हमारे सरकार और हमारे किसानों पर जाता है जो देश को विकशित करने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं Iएक बहुत बड़ी प्रथिष्टिट शिक्षा के केंद्र में बहुत से कर्मचारी हैं और सभी की अपनी अपनी Positions  पद है अपनी गरिमा dignity हैं I

     सुबह को जब सभी लोग स्कूल पहुंचाते हैं अपने अपने कुर्सी,केबिन और कक्षा में पहुँचते हैं चपरासी अपने Boss मालिक के केबिन के बाहर कुर्सी में बैठते हैं फिर काम शुरू होता हैं किचन में चाय बनती हैं चाय की प्याली ले के चायवाला सभी के केबिन, सीट और कक्षा चाय देते हैं I 

चाय जब कप में जाते हैं तो इसका रूप बदल जाता हैं 

     इसमे चपरासी को PAPER Cup में, फाइल देखने वाले को SLIGHT CRACKS Cup में, स्वागत कक्ष के स्टाफ को GLASS TUMBLER Cup में, वहीखाता देखने वाले को TEA Cup में, कार्यप्रभारी को PORCELIN Cup में और मालिक (MD) के महिला सचिव को IMPORTANT COLOURFUL cup में, कंपनी के मालिक Boss को BONE CHAINA Cup में चाय देते हैं I 

      सभी को अपने अपने पद के हिसाब से कप में चाय मिलती हैं  "this is a position" और इस तरह दिन का काम शुरू करते हैं  I

"One Cup of Tea"

         आप चाय पीते हो बड़े ही चुस्की और मजे से, चाय यह नहीं देखती की कौन मुझे पी रहा हैं I  गरीब या अमीर, यह सभी जगह घुमती हैं, सभी के होठों से लगती हैं I

"चाय वही रहता हैं" मगर (प्याला) कप अलग हो जाता हैं, चाहे वो मालिक हो या चपरासी..


ये है चाय की किस्मत.. 

   "Cups gets separated according to positions"


चाय तो पी ली अब एक अच्छी सी कहानी पढ़े : भाग 1 "बारिश वाली रात"


Blog : Baadal Goswami 
                                                   
              

टिप्पणियाँ



  1. बादल भाई, बहुत अच्छा प्रयास है. चाय के इतिहास से आपने परिचित कराया. इस प्रयास को जारी रखें. और बेहतर करने की कोशिश जब तक करते रहेंगे तब तक इस ब्लॉग की सार्थकता बनी रहेगी. ज्ञान गूगल चाचा और विकीपुड़िया जी के पास भी है पर आप के अन्दाज़ ए बयाँ को देखने के लिए हम लोग आपको पढ़ते रहेंगे. बहुत शुभकामनाएँ आपको 🙏

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